September 24, 2022

काव्यालय

अर्पित दीक्षित की प्रतिनिधि रचनाऐं
1.
किसी दिलासे, किसी तसल्ली की चाहत नहीं रही!
ऐ खुशी मुझे तुझसे मोहब्बत नहीं रही!!
मैंने देखे हैं दुनिया में ऐसे तमाम लोग,
इंसान बन गये वो, जब दौलत नहीं रही!!
पहली बार आए हो तुम ही निहारो ये वादियां,
हमारे लिए अब दुनिया खूबसूरत नहीं रही!!
मैं जब भी होता हूं रूबरू खुद से,
यूं लगता है, किसी दुश्मन की जरूरत नहीं रही!!
जब तलक दुनिया पत्थर नहीं हुई,
मेरी नजरों के सामने हकीकत नहीं रही!!
इस पीढ़ी में न शर्म न लिहाज है किसी का,
लगता है इनके सर बुजुर्गों की नसीहत नहीं रही!!

2. मेरी पलकों को ढकते,
गहरी नींदों के साये।
निशा संग वह न जाने कब,
मेरी आंखों में आए।
सन्नाटों को चीर पवन,
लोरी सी मुझे सुनाती है।
और ख्याल की नौकाऐं
पाल उड़ाती आती हैं।
हौले-हौले हाला सी तब,
चढ़े खुमारी के साये।
और जगमग जुगनू ने
रस्ते उसको दिखलाए।
मेरा चेतन जड़ पत्थर सा,
रग-रग निद्रा में डूब गया।
ज्यों ज्यों उतरा उस सागर में मैं,
उदित हुआ एक क्षितिज नया।
नया कल्पना का प्रांगण,
नई नवेली किल्लोंलें।
भानुमती का खुला पिटारा
कुछ चेहरे आकर बोले।

3. टिमटिम तारे झांक रहे हैं।
कितनी अंखियाँ जाग रही हैं,
घड़ियाँ टिक टिक भाग रही हैं।
चेहरे पर मायूसी है
होंठों पर खामोशी है
सांसों में शहनाई है
चारो तरफ तन्हाई है।
नैना बरबस छलक उठे हैं,
वो यादों में घुटे घुटे हैं।
राही कितना एकाकी है
जीवन सारा बाकी है।
टिमटिम तारे झांक रहे हैं…!

4. आसमां में पत्थर..
मत उछालिए..
कोई सुराख नहीं होता,
मुगालते न पालिए!!
दुनिया को अपनी समझ भर समझिए,
टूटे हुए बालों की खाल मत निकालिए!!
दफ्न हुई जिंदगी, मौत खड़ी बज्म में,
बोझ अपनी लाश का अब आप ही संभालिए!!
खामोशियों की बात भी खामोशियों से कीजिए,
शहर में बड़े शोर हैं चश्मदीद गवाह लिए!!
5. एक छोटी सी बूंद,
बादलों से फिसलकर
मेरी पलक पर आ गिरी।
एक छोटी सी बूंद
आंखो से निकलकर
मेरी पलक पर आ फंसी।
एक सफर से थका मुसाफिर,
एक सफर से हारा मुसाफिर।
कुछ क्षण विश्राम……….!
बारिश की आवाज
और भावनाओं का उद्वेग
और अब कोई उम्मीद नहीं
….. वजह किसे मालूम?
6. वक्त वक्त की बात है दोस्तों,
कभी अच्छा वक्त कभी बुरा वक्त
कभी कट जाता है
वक्त कभी कटता नहीं वक्त
कभी वक्त ही वक्त
कभी बिल्कुल नहीं वक्त
कभी आता है आपका वक्त,
कभी हुआ करता है किसी का वक्त
ये वक्त का पहिया
ये इतिहास की डगर
ये भविष्य की यात्रा
ये वर्तमान का सफर!
वक्त वक्त की बात है…..
आओ प्यार के गीत गढ़ें, और इसे खूबसूरत कर दें!
आओ युद्ध का आरंभ करें, और इसे लहू से रंग दें!
तुम्हारी उम्र के बराबर है, तुम्हारे हिस्से का वक्त,
मेरी सांसो के थमने तक ही है, मेरा वक्त!
इसे यूं ही मत गुजरने दो, पकड़ लो दबोच लो,
और पीठ पर बना दो शौर्य के निशान!
या महका दो अपनी सुगंध से, ये पुरातन कब्रिस्तान!
ये तुम्हारे हिस्से का वक्त है,
कोई साझा नहीं कोई सहअस्तित्व नहीं!
कोई समाज की मान्यताऐं नहीं,
पूर्वजों की परंपराऐं नहीं!
मत गवाओ वक्त समाज के लिए सुविधाजनक बनने में,
ये तुम्हारे हिस्से का वक्त है,
ये तुम्हारे वक्त की दुनिया है।
दुनिया और वक्त चलते ही रहेंगे।
कोई था कोई है, वक्त वक्त की बात है…

7. अब ये मत पूछिए कि बरसात क्यों है,
हर रोज इतनी तन्हा रात क्यों है।
उजेलों में मुसकराहट का दौर है,
अंधेरों में गमें हयात क्यों है।
तू ही बता कि मद्धिम आफताब क्यों है,
और तारों में इतना शबाब क्यों है।
मेरे अंदर मचलता अगर समंदर है,
फिर भी पैमाने में शराब क्यों है।
मत पूछ कि..
उजालो को खुद पर गरूर कितने हैं।
सूरज की शह पर मगरूर कितने हैं।
अंधेरो की सियासत तो अमरबेल है,
आपकी गद्दी के जी हुजूर कितने हैं?
आपको अब तक शिकायत है
कि वफा नही की
जरा देखिए तो हम मजबूर कितने हैं।
हम बगावत करे आज तो
तमाशे खड़े किए
मत पूछना मेरे कत्ल के दस्तूर कितने हैं।

8.रात्रि श्यामल, मेघ श्यामल
जग उनींदा, तुम अचल!!
छिप गया लो चंद्र चंचल,
चांदनी हो आई चपल खल
घोर गर्जन, घोर वर्षण,
झंझावत आक्रांत कण कण!!
घोर घिर आई बदरिया,
जल़मग्न है सारी नगरिया!
तब कहो किस भांति रहते,
शांति सागर में अविचल!!
ओ विंध्यांचल, ओ विंध्यांचल!!

रहस्यवाद
1.
बुरा आदमी भी खूबसूरत होता है
समानांतर दुनिया में
जहां वो कर रहा होता है
तुम्हारे प्रारब्ध का हिसाब-किताब
तोड़ रहा होता है,
माया से मोह के बंधन,
तुम्हारी मुक्ति के लिए
वो करता है खुद को कैद।
बुरा आदमी भी खूबसूरत होता है.

2. धीरे धीरे दूसरों की परेशानियां
आप पर असर डालना कम कर देती हैं…
…आप परिपक्व हो जाते हैं।।
धीरे धीरे चीजों और लोगों में
आपकी रुचि कम हो जाती है…
… आप समझदार हो जाते हैं।।
धीरे धीरे आपका कौतूहल और जिज्ञासा
खत्म हो जाती है..
..आप ज्ञानी हो जाते हैं।
धीरे धीरे..
आपके भाव कमजोर होते जाते हैं,
और आप अर्जित कर लेते हैं,
एक नई उपाधि
धीरे-धीरे
आप बूढ़े होते जाते हैं।

3. अमरत्व सबसे बड़ी कैद है
अगर तरंग से है ध्वनि
तो भला कैसे गूंजती है
अंतरात्मा की आवाज?
अगर प्रकाश से है दृश्य,
तो भला कैसे दिखते हैं
नींद में स्वप्न?
मैं तलाशता रहता हूं उत्तर,
मैं बनाता रहता हूं प्रश्न!!
सोचता हूं,
एक रोज सारे प्रश्न खत्म हो जाऐंगे,
सारे उत्तर मिल जाऐंगे!
फिर क्या होगा?
बेचैनी की इस लत का क्या होगा?
युगों-युगों की लत,
जन्म जन्मांतरों की आदत?
ये खयाल भी कितना बेचैन कर देता है,
कितना बेचैन कर देता है ये प्रश्न…
… मैं कुछ प्रश्न बचाकर रख लूंगा,
कुछ उत्तरों को खो जाने दूंगा,
या सामने होने पर भी नजरंदाज कर दूंगा
ऐनक पहनकर ऐनक ढूंढूंगा,
पर प्रश्नों को खत्म न होने दूंगा!
क्योंकि जिस रोज ये प्रश्न खत्म हुऐ
युगों की उम्र मुझ पर आजिज हो जाऐगी
और मैं क्षण भर में रेत सा ढह जाउंगा!
किसी हिरण की तरह,
मैं उस प्रश्न को कस्तूरी बना छिपा दूंगा,
और करता रहूंगा खोज!!
“अमरत्व सबसे बड़ी कैद है”

4. एक गीत लिखने की इच्छा हो रही है,
पर विषय नहीं मिल रहा,
पंक्तियां नहीं उतर रहीं,
दरिया में डूबता हूं पर सूखा ही निकलता हूं!
ताकता हूं आसपास,
वीरान कमरा, खाली अलमारियां
रोशनी को जगह देती खिड़की,
टूटे दरवाजे!
और आस पास बिखरा पुराना सामान,
(मेरा अतीत मुझे ताकता है)
घर के पीछे बना ये कमरा,
मेरे लिए दुनिया की सबसे खूबसूरत जगह है,
जहां बिखरी हर चीज,
यादों का एक पिटारा है,
जो मुझसे बात करते हैं…
सुनता हूं कहीं दूर से उठते
हथौड़े की ठकठक,
घंटी की टनटन,
नहीं… तिनतिन
जो भी है..
जब ये खो जाते बैं सन्नाटे में,
तब सन्नाटों को सुनता हूं!
बेवकूफ डाक्टर इसे टिनिटस कहते हैं,
हां ऐसा ही कुछ..
अपने भीतर के उद्वेग को समेट नहीं पाता हूं,
गीत लिखना तो चाहता हूं, लिख नहीं पाता हूं!
5. अगर?
अगर सिकंदर जीत जाता भारत,
तो?
अगर बुद्ध न जाते नगर भ्रमण,
तो?
अगर हार जाता गोरी फिर एक बार
तो?
अगर…. अगर… अगर…
इतिहास ने चुना है बड़ी सावधानी से मार्ग
स्वार्थ, अपराध, प्रेम, धर्म, त्याग..
सबका चुनाव है लाने को वर्तमान
और लक्ष्य से आज तक अनजान।
इतिहास के एक अगर से इतिहास बदल जाता,
सोचो अगर ऐसा हुआ होता
या अगर वैसा न हुआ होता?
…ये जो बगावत रह रह के उठती है
व्यवस्था से, समाज से, खुद से समय से,
गुलामी की निशानी है!
बड़ी पेचीदा कहानी है,
शासक मर गए, शोषक मर गए
पर बगावत आज भी है,
गुलामी पर नाज भी है
लक्ष्य की पुकार..
गलतियां,
जरा जरा सी गलतियां भी
गलतियां नहीं होतीं,
इतिहास की मुड़ी सड़कें हैं,
उद्देश्य हीन नहीं,
उद्देश्य की मिल्कियत और
तुम्हारी गुलामी की गवाह..
इतिहास आंखें हैं
पर रात गहरी है,
बात गहरी है…
तनिक सो लें
विधि की पलकों में स्पंदन…
मंथर मंथर धुप्प!!!!

6. लिखा नहीं जा सकता,
इसलिए लिख नहीं रहा!
कहा नहीं जा सकता,
इस लिए नहीं कह रहा!
सोचा नहीं जा सकता,
इसलिए नहीं सोच रहा!
पर,
एकांत अद्वितीय है!
उपद्रवों से परे,
दूर नहीं परे!!
तुम से ही नहीं
तुम्हारी कल्पना से भी परे!
इसी एकांत को ढूंढने के लिए तो,
उन महर्षियों ने त्यागे थे समाज
फिर परिवेश
फिर परिवेश की अनुभूति
परिवेश की स्मृति,
विचार,
स्वांस…
(एकांत
गहन एकांत)

7. मैंने कोई जिंदा महान चित्रकार नहीं देखा,
न पिकासो.
न एंजेलो..
न विंसी…
न ही रवि वर्मा!
मैंने देखे है उनकी कल्पना के रंग,
रंगों के विचार.
विचारों के कैनवास..
और कैनवास से झांकते चित्र!!
मैंने देखे हैं-
आंखों में धूमिल पड़ते सितारे (the starry night)
सितारों के बीच अकेला चांद (the last supper)
चांद को ताकता वुल्वरीन (cleopatra and caeser)
उदास वुल्वरीन, मुस्कराता चांद और चांदनी रात!(monalisa)
मैंने देखा है- एकांत, शांत (padmapani)
प्रेम का वेदांत (madhubani)
क्लांत आदम का उत्कर्ष (creation of adom)
मृत्यु का स्पर्श (?)
मैंने देखा है, रक्तिम आकाश, नीला सागर!
और उमड़ घुमड़ आते अमूर्त विचार (royal blue and Red)
अमूर्त, प्रतिपल बनते… बिगड़ते…. रूप बदलते चित्र,
चित्रों में उलझते विचार!
“बादल होते हैं, सबसे महान चित्रकार”
(बाबा कहते थे)

8. किसी रोज तैरता तमिलनाडु दिखता है,
तो डूबता कश्मीर किसी रोज।
देखता हूं खबरों में
तैरता अपना देश हर रोज!
समथिंग इज हैपनिंग हियर,
बट यू डोंट नो व्हाट इट इज,
डू यू मिस्टर जोंस?
कभी कभी खबरों में उभरता है
राजनीति का ज्वार,
कभी फूटता है दामिनी का गुबार!
कभी तैरती हैं मायावी मछलियां,
कभी युद्ध के क्रूर मगरमच्छ
डू यू नो मिस्टर जोन्स?
एक नाव ले आओ
और दो प्याले जाम,
कब तक किनारे बैठ निहारोगे
तालाब में सिमट आए शहर को?
मिस्टर जोंस…….

9. दुनिया को जितना जानता जाता हूं,
उतनी ही जटिल हो जाती है!
रास्ता मुझ से शुरू होता है,
सीधा और सपाट,
तुम तक पहुंचकर दोराहा,
और उन तक पहुंच चौराहा हो जाता है!!
फिर राहों से राहें फूटती हैं,
और मैं हर राह से गुजरना चाहता हूं!!
जिंदगी,
समय की वास्तविक इकाई!
व्यर्थ हो जाती है,
जब आप नए रास्तों से डरकर,
चुन लेते हैं एक जाना पहचाना रास्ता!!
या आप चलना ही छोड़ देते हैं!
जिंदगी खत्म हो जाती है,
रास्ते बचे रह जाते हैं, अनगिनत!
….आप दुनिया को जितना जानते जाते हैं,
जिंदगी उतनी ही जटिल होती जाती है!!

10. जब मैंने तर्क करना शुरू किया होगा!
(हालांकि मुझे ठीक याद नहीं कि पहला सवाल क्या रहा होगा)
मैंने पूछा होगा कि पानी को पानी क्यों कहते हैं,
राख को राख क्यों कहते हैं!
मैंने पूछा होगा कि आग ‘ठंडी’ क्यों नहीं कहते!
मन में रहे होंगे लाखों सवाल!!
मैंने पूछा होगा कि एक और एक दो कैसे हो जाते हैं!
एक में क्यों घटता है एक,
और कुछ न होने को शून्य क्यों कहते हैं,
अब चूंकि शून्य को हाथ मों पकड़ मैं उसे टटोल नहीं सकता,
तो मैंने उठाई होगी मिट्टी
उसे उलट पलट कर, होंठों से बार बार दोहराया होगा मिट्टी!!
पर समझ नहीं पाया होगा कि इसो मिट्टी क्यों कहते हैं,
निश्चय ही गैर-जरूरी समझ किसी ने नहीं दिए होंगे मुझे उत्तर!!
फिर मैंने भी धीरे धीरे मान लिया होगा कि
मिट्टी को मिट्टी कहते हैं,
आग गर्म होती है,
और एक और एक दो होते हैं!!
अब मुझे ये सब सुनने में अटपटा नहीं लगता!
पर जब भी तर्कों को टटोलता तह तक पहुंचता हूं,
पाता हूं एक अनुत्तरित प्रश्न!!
धारणाओं की कब्र के दो हाथ ऊपर तर्कों का ताजमहल!!

जिंदगी
1. हर रोज, ले कर आती है,
वही बासी जिंदगी।
वही उठना, तैयार होना,
वही आफिस, वही सोना।
सब कुछ वैसा ही है,
जैसा बीते कल था।
चार दीवारों से चार दीवारी तक,
वही बासी जिंदगी।
मैं बदल सकता हूँ,
बदलाव में जल सकता हूँ।
है बस यही डर,
जिसे आज तक लेकर,
हर रोज जीता हूँ,
वही बासी जिंदगी।
आज भी जब निहारता हूँ,
खुला आकाश,
सोचता हूँ काश,
तोड़ कर पिंजर
उड़ जाऊं ईधर,
किधर?
हो खुद नहीं मालूम,
पर हो न कोई दासी जिंदगी।
हो न फिर बासी जिंदगी।
सभ्यता की होड़ में,
संस्कृति की दौड़ में,
रोटी के जुगाड़ में,
अपनों के प्यार में,
बंधता गया हूँ आज तक,
आती नहीं आवाज तक,
आवाज जो सुनकर सभी,
पंछी गये उड़कर सभी।
उ़ड़कर उन्मुक्त आकाश में,
बादलों के पास में।
समंदर की लहर में।
आंधियों के कहर में।
है ये बता कैसी कला,
है किसे चिंता भला,
इंसान को बस छोड़कर,
सब बंधनों को तोड़कर,
स्वच्छंद हैं सारे जगत में,
कल, आज, अब तक विगत में।
ऐ मांझी, मुझे अब नाव दे दे,
रास्ते का चुनाव दे दे।
देखता हूँ, खुद मैं वेग को,
धाराओं के आवेग को।
बह जाऊं, डूब जाऊं,
या मोड़ दूं मैं नाव को।
रहने दो मगर स्वच्छंद तुम,
मेरे रास्ते के चुनाव को।

2. जिंदगी बंद है
आज से नहीं
कल से नहीं
एक अर्शे से
जिंदगी बंद है।
मैं सो रहा हूं
आज से नहीं
कल से नहीं
एक अर्शे से
मैं सो रहा हूं।
शोर ओ चकल्लस
इधर भी
उधर भी
परेशान करता है,
आज से नहीं
कल से नहीं
एक अर्शे से..

3.
बदहवास, बेसुकूं,
दीवारों पर तस्वीरें सजाईं,
फोटोफ्रेम, पेंटिंग्स,
नकली फूल,
फिर फूलदानों पर इत्र डाला।
और फिर तलाश की खूबसूरती,
सुकून, खुशबू जिंदगी की।

4.
मैं जिंदगी से हारा नहीं हूं,
बस जीने की कोशिश में हूं।
ये कौन सा मुश्किल है?
पर आसान भी तो नहीं।
भूल चुका हूं जिंदगी को जीना,
इस दौर में तो बेहोशी जीते हैं सब,
बेहोशी से नशे में बेसुध, बरबस हंसते,
बेबस रोते लोगों के बीच
बस जिंदगी जीने की कोशिश में हूं।

5. आखिरी रोज मैंने उम्र, पन्ना-दर-पन्ना पलटनी शुरू की!
बचपन कब शुरू हुआ और बचपना कब खत्म हो गया,
समझना सरल है समझाना मुश्किल!
मैं बड़े धीमे धीमे चल रहा था,
और जिंदगी बहुत तेज!!
बूढ़ा बरगद जिसने मुझे अपनी डालों पर झुलाया है,
उसके लिए मैं बहुत जल्दी बूढ़ा हो चला था!
आखिरी दिन जब मैं थमा तो फिर चुपचाप उसकी गोद में आ बैठा!
उस आखिरी सुबह केवल चिंताऐं थीं,
क्योंकि अभी वक्त बाकी था!
हर बात अधूरी सी लगती थी,
मंजिलें भी करीब करीब दिख रही थीं!
हर बात को उसके अर्थ तक पहुंचाना था,
क्योंकि किसी बुजुर्ग ने कहा था,
एक दिन,
हर बात का मुकम्मल अर्थ मालूम होगा,
और वो दिन इस आखिरी दिन के पहले तक कभी आया न था,
मैं हर दिन अपने अतीत को बुनकर आकार देना चाहता था,
पर थक जाता था बुनते बुनते..
जज़्बातों की गर्मी में हर चीज पिघलने लगती थी,
और वर्तमान में समा जाना चाहती थी,
जैसे सारा संसार ही मेरा जमा हुआ अतीत है,
विचारों के अतिरेक को संभाल नहीं पाता था,
कविता पूरी तो करना चाहता था, पर कर नहीं पाता था!

6. ऐ जिंदगी क्या है तू!!
सांसो की डोर, दिल की धड़कन
नसों में बहता गर्म
खून या कुछ और? ऐ जिंदगी क्या है तू?

तर्कों की गणित
स्मृति का संग्रह
भावनाओं का समंदर!!
या कुछ और?
ऐ जिंदगी क्या है तू?

माटी का शरीर, कैद रूह
परमात्मा का अंश,
या कुछ और?
ऐ जिंदगी क्या है तू?
ज्ञानेंद्रियों का ज्ञान,
कर्मेंद्रियों का कर्म,
या मष्तिष्क में तैरते विचार
ऐ जिंदगी क्या है तू?
अतीत का संग्रह,
वर्त़़मान का कर्म
भविष्य की योजना
ऐ जिंदगी क्या है तू!!

स्वप्नों का द्वार,
पूर्व प्रायोजित स्मृति अंबार,
या कल्पना का विस्तार,
ऐ जिंदगी क्या है तू

7. सुनो वक्त बीत रहा है,
जिंदगी खत्म हो रही है,
और तुम्हारी भावनाऐं अज्ञात डर से घुट रही हैं!
सुनों
वक्त बीत रहा है
जिंदगी खत्म हो रही है
उम्र निकल रही है।
और तुम्हारी इच्छाऐं अकर्मण्यता से दबी जा रही हैं!
सुनो,
वक्त बीत रहा है,
उम्र निकल रही है!
जिंदगी खत्म हौ रही है,
और तुम्हारी पीठ पर जिम्मेदारियां और अपेक्षाऐं पहाड़ सी हो चली हैं!
सुनो,
जरा खुद को देखो,
थथोलो,
कोई उलझन तो नहीं जेहन में?
कोई टीस तो नहीं दिल में!
कोई बोझ तो नहीं आत्मा में,
………तो फिर खोलें पाले?
…….. चलाऐं पतवार?
…….चल ले चल मांझी उस पार!!!!!
8. वक्त की पटरी पर
जिंदगी दौड़ती है
खटपट खटपट
भविष्य को चीरती हुई
गूँजती हैं सीटियाँ
और अतीत के हिस्से में
धूल के गुबार।
आशाओं के झोंके
छूकर गुजरते हैं,
भाव और संवेग!!
बिखरा पड़ा है
एकाकीपन और सन्नाटा
और अंधेरों में खड़ा
प्रकृति का मधुवन
दूर कहीं चराग चलते हैं,
रात भर
हम अभी सोए नहीं हैं।
और नजारे छूटते हैं
था जहाँ जीवन….!!
प्रेम/श्रंगार
1.कितने अर्शे बाद दिखे हो
मत पूछो अब कैसे गुजरी,
एक झलक पाकर तेरी
रात तेरे ख्वाबों में गुजरी!
वीरान पड़ी राहों से गुजरे,
जिन ख्वाबों को आंखों पाले,
आंख मिली तो थम गया वक्त,
आंख लगी तो सदियां गुजरीं!!

2.कहां कहां नहीं ढूंढा तुम्हे,
जहां तुम न थे वहां भी ढूंढा तुम्हे!
हर चेहरे में तलाशते रहे अक्श तेरा,
अक्श गुम होने तक ढूंढा तुम्हे!!
कहीं तेरी आंख मिली, कहीं होंठ
तो कहीं सादगी तेरी!
मुकम्मल तुम न मिले,
कितना नहीं ढूंढा तुम्हे!!

3. तू….. मै…..
और एक साझा ख्वाब..
जहां हमारे बीच खामोशी होगी
पर कोई नाराजगी नहीं,
मैं तेरे हुस्न से एक शहर बनाऊंगा,
और अपनी मोहब्बत से दो आंखें,
दिनभर शहर निहारते निहारते
जब रात आंखें सो जाऐंगी,
तो मैं एक नया ख्वाब सजाऊंगा,
तेरे हुस्न से मैं संगीत बनाऊंगा,
और अपनी मोहब्बत से कान..
और जब रात भर उसमें तैरते तैरते,
मैं डूब जाऊंगा,
तो मुझे अपनी गोद में लिटाकर
अपनी उंगलियां मेरे माथे पर फेरते रहना,
और मुझे हमेशा के लिए सोने देना।
मैं एक साझा ख्वाब बनाउंगा
मैं… तू…

4. कहां से शुरू करूं..?
तुम्हारे हुस्न से,
तुम्हारी अदाओं से,
तुम्हारी चहकती आवाज से,
तुम्हारे जिंदादिल अंदाज़ से।
तुमको रेजा-रेजा बिखेरकर भी रख दूं,
तो भी तुम उतनी ही पूरी हो,
उतनी ही दिलकश हो,
उतनी ही हसीन हो।
हम तब चलेंगे साथ साथ..
जब खत्म हो जाऐंगी
रास्तों में पड़ी सिलवटें सारी
जब दोराहे, तिराहे या चौराहे,
बंद कर देंगे सांकेतिक इशारे
जब चांद की फर्श पर,
मखमली कालीन के अनछुए धागे
करेंगे इंतजार..
और जुगनुओं का कारंवा
टिमटिमाते तारों के संग,
खींचेंगे लश्कर हमारा।
हम तब चलेंगे साथ साथ,
इस जहां से दूर,
इंद्रधनुषी नभ के किनारे..
खुशबू भरे माहौल में,
जहां हवाऐं बहती हैं,
मदमस्त सी..
वो सर्द रातों में सिकुड़ कर बैठ जाती हैं,
परों में रंग समेटे मासूम तितलियों की खामोशी से
करने को गपशप, रात भर..
हम तब चलेंगे साथ साथ..

5.
नागमणि सी नीली आंखें
तुम्हारी नागमणि सी नीली आंखें,
सम्मोहित करती हैं,
ललचाती हैं
इनमें डूब जाने का जी करता है,
जी करता है कि इनमें खो जाऊं,
और कहीं दूर निकलूं
बहुत दूर बहुत गहरे,
बहुत एकांत…
मानो कोई समुद्र,
फिर भले ही आऐं झंझावत,
भले ही हों लहरें खिलाफ
मैं जीवन का जुआ हारने को तैयार हूं!
क्योंकि ये मृत्यु न होगी मोक्ष होगा,
तुम फिर श्वेत प्रकाश बन मुझे रास्ता दिखा रही होगी,
और मैं बच्चे सा कौतूहल से तुम्हे देख रहा होऊंगा!
ये प्रेम अमर है,
फिर भला क्यों गाऐं विरह के गीत?
प्रेम तो उत्सव गीत है!
प्राणों में उठती उत्सव की पुकार…
मुझे प्यार है, क्योंकि तुमने जिंदगी के मायने सिखाए,
आंखों के आंसू में दर्द मत खोजो
ये तो सीप के मोती सा उपहार है!
जिसकी चमक उस दुनिया से लौटने के लिए,
सम्मोहित करेगी मुझे फिर एक बार,
क्योंकि हम कभी अलग नहीं हो सकते!
सम्मोहन, गहरा सम्मोहन
जैसे धुप अंधेरे में जलती कोई आग,
जैसे किसी जलपरी का गीत,
जैसे तुम….
ये प्रेम अमर है,
फिर भला क्यों गाऐं विरह के गीत?
प्रेम तो उत्सव गीत है!
प्राणों में उठती उत्सव की पुकार..

.
6. न मय की जरूरत है,
न मयखानों की जरूरत है!
उनके जलवों को भला
किन पैमानों की जरूरत है!!
उनके जुल्फों में फंसे भंवरे,
उनकी आंखों में बसे जुगनू!
उनको भी भला क्या,
दीवानों की जरूरत है!!
दिल दिमाग जिस्म जां,
सब है इश्क की गिरफ्त में!
हम आशिकों के लिए भी क्या
कैदखानों की जरूरत है!
7. तुम सामने आते हो,
और मेरी सारी ऊर्जा तुम्हारी ओर दौड़ने लगती है!
मानो मां को देखकर बच्चा,
निगाहों को ढांकता हूं,
तो लफ्ज,
लफ्जों को पकड़ता हूं
तो विचार,
विचारों को घसीटता हूं
तो निगाहें निगाह बचाकर,
तुम तक पहुंच ही जाती हैं!
और मैं इसी रस्साकसी में
उलझकर रह जाता हूं॥
उलझना
उलझन
गांठे
मन की गांठे,
तिलस्मी होती हैं!
कविता के छंद से,
स्वप्न के द्वंद्व तक
शेक्सपियरे के हेमलेट से,
फ्रायड के लिबिडो तक,
रस्साकसी…
ये नेह, नेह के धागे!!

8. जब तुम होगे मुझसे रूबरू,
धारणाऐं टूटेंगी.
स्वप्न बिखरेंगे..
और अहसास असहाय हो जाऐंगे…..
जब मैं होऊंगा तुमसे रूबरू,
धारणाऐं टूटेंगी.
स्वप्न बिखरेंगे..
और अहसास असहाय हो जाऐंगे…..
(एक मैं और दुनिया,
एक तू और दुनिया,
न मैं……
न तू…….
बस दुनिया!!)
जब होंगे दुनिया से रूबरू,
धारणाऐं टूटेंगी…..
स्वप्न बिखरेंगे…………..
और अहसास असहाय हो जाऐंगे..!!

9. तुम्हे तलाशना…
मानो किसी स्वप्न का पीछा करना!
स्वयं में डूबना और डूबते जाना!
तेरी धुंधली सूरत नजर आना..
…….ओझल हो जाना!
तुम्हे तलाशना, मानो किसी स्वप्न का पीछा करना!
किसी राह से गुजरना, तुम्हे ढूंढ़ना,
भीड़ में तुझ सा कोई नजर आना!
बीता बीता सा लगना हर किस्सा,
हर गजल में तेरा जिकर आना,
तुम्हे तलाशना..
….मानो किसी स्वप्न का पीछा करना!!
किसी नदी का बलखाना
किसी पर्वत का उभार लेना,
किसी वृक्ष का फलना- फूलना
या किसी हिरण में तेरी आंखें नजर आना!
तुम्हे तलाशना…
…मानो किसी स्वप्न का का पीछा करना!!

10.
हमें भी मरीजों में शुमार कर रहे हैं।
वो जानबूझकर हमें बीमार कर रहे हैं।
ये बातों का जादू,ये बदन की नुमाइस,
उफ कैसे कैसे मर्ज तैयार कर रहे हैं।
नब्ज देखते भी नहीं, और बोल पड़ते हैं हकीम,
मियां, आजकल कहाँ आंखें चार कर रहे हैं।

11. एक संजीदा देखा मैने मुर्दों के चौराहे में
दिल धड़क धड़क कर ठिठक गया कोई आकर बसा निगाहों में
एक बीज दबा दिल में गहरे आँखो ने पी बहती हाला,
भावों की मंद बयार बही संसार बना एक मधुशाला।
चंचल नयनों की लुकाछिपी, वो खुली हंसी बेबाकीपन
मित्रों की सांकेतिक चुहलें, वो तनहाई की कटु उलझन।
वो बार बार मिलने का इच्छा, वो बढ़ता सौंदर्यगान।
भावजगत की फंतासी वो दिल को छूती संगीततान।
मुझ अदने प्यासे खातिर बहते दरिया का रुक जाना,
नजरों से नजरें मिलते ही कुछ छुईमुई सा शरमाना।
खामोशी भरी निगाहों वो दृष्टिपात मुस्कान भरी,
उमड़ उमड़ कर बरसी मुझ पर प्रेमसुधा अरमान भरी।
वो बढ़ी शरारत शाँत हृदय की बढ़ता जाता साज-सजन।
वो दो पल की छोटी खामोशी ख्वाब सजाता अंतर्मन।
रजनी के घोर तमस में बेचैनी जगती आँखों की ,
जेठ की गर्म उमस में शीतलहर अहसासों की।
अगहन के कोहरे सा कोई ढक गया मेरा तन मन जीवन
नादानी का दाना ठग गया नयनों का एकटक बंधन।
मावस के ध्रुवी अंधेरों में, एक दीप निरंतर जलते देखा
दिल में सजो उजेलों को, एक राह नई मिलते देखा।
उस स्थिर शांत स्वच्छ नीरव में था प्रतिबिंबित अक्श मेरा।
लम्हा लम्हा साथ मेरे ही दिल तेज धड़कना साथ तेरा।
चलते फिरते यूँ अनायास ही, आकर मुझसे टकरा जाना,
जुल्फों का डालों सा झुकना, देख मुझे घबरा जाना।
चंचल नयनों का रुकना मुझ पर, मोड़ो पर यूँ ही मिल जाना,
वो मेरे बिन की बेचैनी, देख मुझे मुस्कानों का वो खिल जाना।
बार बार कुछ कहने की इच्छा, बार बार वो चुप हो जाना
चेहरे पर आती नई ताजगी वो ख्वाबों में तेरा गुम हो जाना।
मायूस लबों में नाम मेरा, वो नजरों से ओझल न होना।
वो पहल मात्र का आलंबन, वो मधुर मिलन के ख्वाब संजोना।

वक्त हवा के साथ बहता है, बचते हैं जुदाई के चंद दिन।
भावों में रह रह उठे कसक, मायूस जिंदगी उसके बिन।
अहसासों का ये धुंधलापन, बनता दिल का भार नया ,
कुछ कहने भर की बेचैनी थी, मन में उठता उद्गार गया।
शुरुवात मात्र की शिद्दत में, दिल में रह गई प्रेम विरह।
न मिलने वाली राहों में कसकों टीसों की नई जिरह।
जुदाई की मासूम घड़ी में नजरों का, वो खामोश मिलन।
प्रश्नभरी वो दृष्टिवेदना, बार बार फूटती सिसकन।
यादों को तेरी दफना कर, अहसासों को बलि वेदी में रखकर,
वापस न मुड़ने की सौगंध भीष्म आँखों में भीगे ख्वाबों को लेकर।
एकाकी जाती राहों में वो आहट जानी पहचानी है।
यादों की कब्र बनाकर अब, अहसासों की चिता जलानी है।

12. जो खयाल में आता है, वो अनजान थोड़े है।
शहर अजनबी है, पर सुनसान थोड़े है।
नुमाइश गाह में देखी थी तबस्सुम उसकी
उफक है हया है, गरदूँ में बदनाम थोड़े है।
दिल मुनतशिर, जुबां में लर्जिश है,
उल्फत में गुफ्तगू का इम्तेहान थोड़े है।
कफ़स की दरारों से अंदाजा मत कर,
तेरी मुट्ठी भर आसमान थोड़े है।
तख़य्युल के तायर की पर्वाज जरा देख,
गम से अफ़सुर्दा सारा जहान थोड़े है।

13. तुम सुंदर नहीं थी,
तुम अद्वितीय नहीं थी
तुम्हे चांद नहीं कह सकता,
तुम गुलाब नहीं थी!
पर तुम जो भी थी
मेरा पहला प्यार थी,
और बस इसीलिए..
मैं तुम्हे नहीं भूल सकता!
और हां
मैं पूरी ईमानदारी से कहता हूं
कि मैं तुम्हे नहीं भूल सकता!
भले ही तुम कितनी ही दूर हो,
भले इतनी दूर कि दुनिया दीवार बन जाऐ,
पर मैं तुम्हे नहीं भूल सकता!
हर बाजार में,
हर सड़क में,
हर जगह जहां मोहब्बत का खयाल आऐगा,
मेरी आंखें तुम्हे खोजेंगी,
मर जाऐंगे पर ये खुली रहेंगी,
मैं मरने के बाद भी तुम्हे नहीं भूल सकता!
क्योंकि तुम मेरा पहला प्यार हो!!
पहली नजर का इश्क हो,
पहली महकती सांस हो,
पहला काला जादू हो,
पहला सम्मोहन हो
या मेरी पहली आत्ममुग्धता हो,
कुछ भी समझ लो,
पर मैं तुम्हे नहीं भूल सकता!
वो बहुत थोड़े पल,
बहुत थोड़े जो
तुम्हारे साथ गुजारे,
मैं कभी नहीं भूल सकता!!
तुमसे एक बार मिली नजर का सम्मोहन,
सारे इंद्रजालों से ज्यादा जादुई है,
पर तुम जादूगरनी नहीं,
ये मेरा पहला प्यार है जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता!!
न मालूम तुम्हे मैं याद हूं न हूं
पर मन ढांढस दिलाता है कि जब तक तू चाहेगा उसे
तेरा पहला प्यार तुझे कभी नहीं भूल सकता!!
जब जब स्वप्न देखोगे एक साथ देखोगे
और दुनिया अलग खड़ी होकर के देखेगी,
कि पहला प्यार कभी नहीं भूल सकता!!

वियोग
1.फूलों को चाहने वाले हज़ार होंगे,
तोड़ने वाले रास आएंगे, देखने वाले दागदार होंगे!
हमें तो चंद तितलियों ने दिया था गुलसन का पता,
सोचा था साथ रहेंगे तो गुलज़ार होंगे,
ऐ रक़ीब अब तू ही पूरी कर चाहतें अपनी,
हम इश्क़ के कूचे में हरदम बेज़ार होंगे।

2. हाथों की लकीरों से
फिसलकर चला गया,
एक लम्हा गुजरकर चला गया।
आईना उलझा रहा
निगाहों के जाल में,
एक चेहरा संवरकर चला गया।
बहर से खारिज है नज्म,
मतले से,
एक शख्श निकलकर चला गया।
जो गुरूर था
धरती को रोशन हुस्न पे,
एक सूरज बदलकर चला गया।

3.एक अजीब बला ऐ जान बन गई है,
जान की दुश्मन ही जान बन गई है।
गुनाह लगता है लबों में वो नाम बार बार,
किसी काफ़िर की अजान बन गई है।
दिल जलता है हर एक का यहां,
दिल्लगी आजकल शमशान बन गई है।
थका हारा उस आगोश में सो जाता हूं,
उसकी याद मेरा माकान बन गई है।
तूने ने हिज्र दी तोहफे में अलविदा कह कर,
सुनो अब वही मेरी पहचान बन गई है।

4. बड़ा मुश्किल है उनसे ताल्लुक रखना,
जो चाहते ही नहीं कोई ताल्लुक रखना।
मेरी नजर अब कहां बहलती है तमाशों से,
छोड़ दिया मैंने नजारों से ताल्लुक रखना।
आज भी चांद मशगूल है सितारों से फलक पर,
आफताब को आता नहीं ताल्लुक रखना।
जरा मुझको भी दखल उसका रास नहीं आता,
जरा उसको भी नहीं आता ताल्लुक रखना।
ख़ैर अब कौन गम खामखां कुछ और पाले,
क्यों भला अब किसी से कोई ताल्लुक रखना।

5. اور بھلا کِسی کو کیا دےگا،
یے اِسک فِر کِسی کو دگا دےگا۔
और भला किसी को क्या देगा,
ये इश्क फिर किसी को दगा देगा।
اےک بورے کھواب سا رات مےں
نید سے تومکو بھی ذگا دےگا۔
एक बुरे ख्वाब सा रात में
नींद से तुमको भी जगा देगा।
ہِصر اگ سی فےلےگی سوکوں پر
وؤ کھواب مےں آ آ کے ہوا دےگا۔
हिज्र आग सी फैलेगी सुकूं पर,
वो ख्वाब में आ आ के हवा देगा।
درد کی زندگی بخشی ہے مجھے جالم نے،
مر ن جاؤں کنہی یہ سوچ دوا دیگا۔
दर्द की जिंदगी बख्शी है मुझे जालिम ने,
मर न जाऊं कहीं, ये सोच दवा देगा

6. पास कुछ है ही नहीं,खोने के लिए,
दिल होना चाहिए,ये अहसास होने के लिए।
एक अर्से तक बुतों से लिपटकर रोऐ,
कोई कांधा न था, सर रख के रोने के लिए।
सब गैर ही तो लगते हैं, कौन है अपना भला,
दर्द अपनाऐ कौन सब के, सबका होने के लिए।
एक रोज जिंदगी ने देखे ख्वाब हमबिस्तर,
इजाजत नहीं देती अब रात सोने के लिए।

7. खुद, खुदा या खुद्दारी,
कुछ भी तो नहीं अब!
यूं हुए बेघर कि,
ठिकाना नहीं कहीं अब!
मयकदे भी बंद,
बुतकदे भी बंद,
क्या गलत क्या सही अब!
एक नाशाद सा मैं,
एक गुमनाम सा वो,
हिज्र ही खुदा अब,
हिज्र ही नबी अब!!

8. शिकस्त हो गया
शिकस्त हो गया मैं आजमाते आजमाते,
थक गया है तू भी निभाते निभाते!
अब दूर हैं तो दूर ही सही,
हम मगरूर हैं तो मगरूर ही सही,
रुक गया वक्त कमियां गिनाते गिनाते,
थक गया है तू भी निभाते निभाते!
मान-सम्मान-अपमान बताते बताते,
रंज,गम और खलिश को जताते जताते!
आंख भर आई आंसू छिपाते छिपाते,
जल गये हाथ दीपक जलाते जलाते!
हूबहू मेरे से हो गये आइने,
पर्वत खड़े कर दिए राई ने,
दुख रहीं उंगलियां अब उठाते उठाते,
थक गया है तू भी निभाते निभाते!!

9. शराब ओ सबाब को छोड़ कुछ बात करो
हक़ीक़त ओ ख्वाब को छोड़ कुछ बात करो,
दो दो हाथ करने को ललकारती दुनिया
जरा इसकी कलाई मरोड़ कुछ बात करो।
उस रोज….
तेरी बात के बाद उनकी बात हुई
उनकी बात के बाद हर बात हुई
और यकीन मानो…
फिर हर बात में तेरी बात हुई।
सुन सुन के ये किस्से बोले मेरे रक़ीब
यार अर्पित, कुछ और बात करो।
बड़े दिनों से नही हुई है बात तुमसे
जरा फुरसत मिले तो आओ कुछ बात करो.

10. मोहब्बत से नफरत हो गई है मुझे!
और नफरत से मोहब्बत हो गई है मुझे!
ये जिंदगी अब बोझ सी हो चली है,
इन सांसों से कब्जियत सी हो गई है मुझे!
जब भी हटाता हूं, अजनबी सा दिखता हूं,
इन नकाबों की आदत सी हो गई है मुझे!
डूब कर जिंदा हूं, निकलूंगा तो मर जाऊंगा,
अब दर्द की जरूरत सी हो गई है मुझे!
उसी को जताता हूं उसी को छिपाता हूं!
ये गजल भी सियासत सी हो गई है मुझे!
मोहब्बत से नफरत हो गई है मुझे,
नफरत से मोहब्बत हो गई है मुझे.
11. यूं ही किसी पे ऐतबार न कर,
ऐ दोस्त नकाबों से प्यार मत कर!
आइनों की तो फितरत है दिल्लगी करने की,
तू अपने अक्श से आंखे चार मत कर!
एक झोंका हवा का तेरे पास से गुजरा है,
किसी सावन का इंतजार मत कर!
ऐ रकीब सुन, जिसे न हो कद्र वफा की,
अपने जज्बातों का ऐसा राजदार मत कर!
12. देखता हूं तुम्हे जब नजर फेरकर,
सोचता हूं मिली तुम बड़ी देर कर,
मधुमास लेकर विदा चल पड़ा,
सन्यास लेकर निमंत्रण खड़ा!
ले उड़ा प्रेम मधु भ्रमर काल का,
उड़ गया खग बाशिंदा था जो डाल का
अब चांद निकला, तो क्या चांद निकला,
अब नैन रूंधे तो क्या नैन रूंधे!
अब याद आई तो क्या याद आई,
अब गीत गूंजे तो क्या गीत गूंजे!
बेसुध से हैं श्रंगार के सब ययावर
ये चूड़ी ये कंगन ये बिछिया महावर,
जा रहा हूं मगर छोड़ मैं प्रीति का घर
गूंजे हमेशा जहां आह के स्वर,
पुराने प्रणय गीत गाऊं कहां?
क्षणिक छद्म अपना छिपाऊं कहां?
अब नये सूर्य को खोज ले ऐ गगन
महक नव समेटो सुबह की पवन!
मुझे रात दे दो, विश्राम दे दो,
चिर काल तक आराम दे दो!
सुना दो जरा स्वप्न की लोरियां
सुला दो मुझे दे दे थपकियां!
13. कितना चाहा भूलना मैंने,
अपने गुजरे कल को,
कोई लोहार सा पीट रहा है,
फिर भी अंतस्थल को।
मत प्रश्न करो, क्यों हूँ पीता मैं
दुनिया भर की हालाऐं
मैं डाल डाल कर बुझा रहा हूँ,
विरह की निर्दय ज्वालाऐं।
वादी में बचपन बीता है,
घाटी पर मेरी तरुणाई,
मैं देख देख कर बड़ा हुआ हूँ,
ऊंचे पर्वत गहरी खाई।
कैसे स्मृति से मिटा सकूँ
मैं नदियों की कलकल को।
कोई लोहार सा पीट रहा है, मेरे अंतस्थल को।
14. कब लौट के आते हैं जाने वाले,
बेवफा होते हैं हमेशा ही बहाने वाले।
कुछ दर्द था दिल में, जिसकी तपिश थी,
शायरी सिखा गये प्यार सिखाने वाले।
शहर में आया था मेरे मशहूर सा हाकिम,
मरीजे इश्क को ले आए दिखाने वाले।
टूटते तारे में देखा मैंने कल का सूरज,
मुकम्मल हो गये सब ख्वाब पुराने वाले।
मुल्तवी हुक्म थे जिनके सारे के सारे ,
रूबरू कब हुए हुक्मरान जमाने वाले।
कल ही खाली कर दीं मैंने अपनी जेबें,
नजर नहीं आते अब प्यार जताने वाले।
15. एक पत्थर का बुत है
शहर की कोई शख्शियत
हालातों में ऐसे खुद है
शहर की कोई शख्शियत
शीसे का महल है,वो भी बेपर्दा
बेफिक्र है फिर भी, शहर की कोई शख्शियत
ऐसा निजाम है सजदा जरूरी है
जिंदा खुदा है शहर की कोई शख्शियत
जब शीसे के जज्बात थे हर हाथ में पत्थर थे।
अब पत्थरदिल खुदा है शहर की कोई शख्शियत!

16. तुम कहती हो कई साल गुजर गए,
हमें अलग हुए,
अच्छा तो फिर क्या तुम्हें यकीन है,
कि तुम मुझसे अलग हो?
या खुद से झूठ बोल रही हो।

अलग होकर भला वक्त कौन गिनता है,
लम्हों को सदियों मे कौन बदलता है,
और सदियों मशगूल दिखने की जद्दोजहद,
अलग होकर कैसे दिख सकती है।

तुम्हे मालूम है मैं तुमसे झूठ बोलता हूं
और तुम खुद से..
यही कि, कई साल गुजर गए हमें अलग हुए।

और काश कि मैं तुमसे अलग हो पाता,
दिल से तुम्हे निकाल पाता,
दिमाग के एक हिस्से में,
जहां तुम्हारा अवैध कब्जा है,
खाली करा पाता।
और सपनों के शहर में बंद करा सकता,
तुम्हारी मनमाफिक आवाजाही,
और ये हुए तो कुछ दिन नहीं गुजरे,
और तुम कहती हो कई साल गुजर गए,
हमें अलग हुए..

ऊबरमेंच
1. युगों युगों से स्वप्नलोक में,
मैं जीता हूँ मैं मरता हूँ।
नित नये रूप मैं धरता हूँ।
मेरा संसार रहा झूठा,
कभी मेरा स्वप्न नहीं टूटा।
तख्तो को पलटते देखा है।
ताजो को उछलते देखा है।
रमणी का यौवन देखा है।
पुरुषार्थ मचलते देखा है।
देखा है पर्वत शिखरो को।
नील गगन मे अंबर छूते।
सागर की गहराई देखी।
जल को देखा कमतर होते।
युग अनंत से चेतन हूँ मैं,
कल्पान्तर का साक्षी हूँ मैं।
मै अनंत का अंशमात्र हूँ।
पर अनंत से अक्षय हूँ मैं,
पर एक बात निश्चय की अनुभव
एक कहानी हरदम देखी।
जीवन मे शोर बहुत होता है।
है अर्थ बेमानी,एक अनदेखी।
इच्छाऐं जलती रहती है।
जज्बात धधकते रहते है।
ये जीवन का संघर्ष कठिन है।
कुछ कहते कुछ चुप रहते हैं।
परिवर्तन की अकुलाहट है।
कुछ कर जाने की चाहत है।
अवसर का संघर्ष क्रूर है।
हम पाते खोते रहते है।
इच्छाऐं जलती रहती है…….
जज्बात धधकते रहते है………..!
मैं मोहपाश में बंधा हुआ।
मैं मायाजाल में फंसा हुआ।
मेरे कर्म नहीं मेरे
मेरे स्वप्न नहीं मेरे
जीवन स्वप्नो की यात्रा है।
मृत्यु है मिली पड़ावो मे।
हर जीवन एक आडंबर था,
जो गुजरा था चंद दिखावो मे।
अब तो एक उद्देश्य मात्र है।
उस सागर मे मिल जाने दो।
जीवन एक बूँद है पानी की,
उसे पानी मे मिल जाने दो।

2.कैसे करते हो तुम फर्क
कि कौन अच्छा है, कौन बुरा है।
कौन खाली है, कौन भरा है।
किसमें इंसानियत है,
कौन पत्थर है।
कौन बदतर है,
कौन बेहतर है।
कैसे करते हो फर्क?
हो सकता है हिसाब करते हो,
भविष्य में उसकी संभावनाऐं। त
लाशते हो जुड़ने का जोड़
अलग होने का घटाव,
गुण का गुणा
भाग्य का भाग
कैसे करते हो फर्क?
शायद तुम अतीत के गिरेबां में झांकते होगे
शायद स्मृतियों का सागर थथोलते होगे।
शायद अनुभूतियों में गोते लगाते होगे,
शायद पूर्वाग्रहों के चश्मे आजमाते होगे।
कैसे करते हो फर्क?
तुम क्यों अपेक्षा करते हो?
कि मैं खरा उतरूँ तुम्हारे मापदंडों पर,
चलूँ तुम्हारे दिखाऐ रास्तों पर,
सीखूँ तुम्हारे तौर-तरीके,
या फिर निभाऊँ तुम्हारे रस्मो रिवाज।
क्या जरूरी है कि अं
धे धृतराष्ट्र को देख हर गाँधारी बाँध ले आंखों में पट्टी।
आखिर क्यों?
हमारे जिस्म ही नहीं
वरन रूह भी अलग अलग है
अब तक….
मेरे हिस्से का आसमान
मेरी आंखों ने देखा है,
मेरे कानों में गूँजती है मंजिल की पुकार,
और मेरे रास्ते पर मेरे कदम ही थाप देंगे
तुम्हारी अपेक्षाऐं नहीं…..
मुझे तुम्हारी आलोचना से फर्क नहीं पड़ता,
मेरे शब्द इतने सक्षम हैं, कि तुम्हे खामोश कर देंगे।
मेरे कर्म इतने सम्मोहक हैं कि तुम्हे सम्मोहित कर लेंगे।
मेरा अस्तित्व इतना गहरा है कि तुम्हारी नफरत डूब जायेगी।
लेकिन फिर भी मैंने मान लिये तुम्हारे दिल के उन्माद।
क्योंकि संग्रह ही है सारे झगड़ों की फसाद।
तुम मुझे प्यार कर नहीं सकते, क्योंकि मैं प्यारा नहीं।
तुम मुझे नफरत भी नहीं कर सकते, क्योंकि मैं आवारा नहीं.
तुम मुझ पर तरस भी नहीं खा सकते क्योंकि मैं बेचारा नहीं।
तुम मेरा साथ भी नहीं दे सकते क्योंकि मैं हालात का मारा नहीं।
तुम्हारी भावनाओं की सारी लिप्साऐं उस संग्रह को छूती हैं,
जिसे मैंने पकड़ रखा है, और अपने अस्तित्व में जकड़ रखा है।
इसलिए मैं छोड़ रहा हूँ वो जिसकी तुम आलोचना करते हो,
और यकीनन वो मैं नहीं।
मै ढूँढ रहा हूँ अपनी जिंदगी के आयाम।
हर रास्ते से गुजरकर।
हर अजनबी को बारीकी से देखकर।
जो कई बार मुझे अँधेरी गलियो मे मिलती हैं।
जो मेरे घर के अरीब करीब
या यूँ कहें आगन से ही गुजरी थी।
छोड़ दिए हैं लक्ष्य और मकसद के उपमान।
जो दूसरो की उँगलियो ने किसी रास्ते के अंत मे बताऐ थे।
अब तक उन्हे जाना ही कहाँ है?
देखते हैं कि ये कहानी अधूरी रहती है या पूरी
उंगलियों में लय है पर कलम घिस चुकी है
और मैं नहीं जानता कि दूसरा छोर कहाँ है
शायद वहाँ जहाँ से शब्द मिलना बंद हो जाऐं,
या कड़ियाँ टूटने लगें और रुचि स्वच्छंद हो जाए।
हालाँकि नजरें अब थक गईं हैं
शब्द एकाकी पड़ जाऐंगे सन्नाटों के बीच
पर कहानी तो लिख ही गई।

3. अगर तरंग से है ध्वनि
तो भला कैसे गूंजती है
अंतरात्मा की आवाज?
अगर प्रकाश से है दृश्य,
तो भला कैसे दिखते हैं
नींद में स्वप्न?
मैं तलाशता रहता हूं उत्तर,
मैं बनाता रहता हूं प्रश्न!!
सोचता हूं,
एक रोज सारे प्रश्न खत्म हो जाऐंगे,
सारे उत्तर मिल जाऐंगे!
फिर क्या होगा?
बेचैनी की इस लत का क्या होगा?
युगों-युगों की लत,
जन्म जन्मांतरों की आदत?
ये खयाल भी कितना बेचैन कर देता है,
कितना बेचैन कर देता है ये प्रश्न…
… मैं कुछ प्रश्न बचाकर रख लूंगा,
कुछ उत्तरों को खो जाने दूंगा,
या सामने होने पर भी नजरंदाज कर दूंगा
ऐनक पहनकर ऐनक ढूंढूंगा,
पर प्रश्नों को खत्म न होने दूंगा!
क्योंकि जिस रोज ये प्रश्न खत्म हुऐ
युगों की उम्र मुझ पर आजिज हो जाऐगी
और मैं क्षण भर में रेत सा ढह जाउंगा!
किसी हिरण की तरह,
मैं उस प्रश्न को कस्तूरी बना छिपा दूंगा,
और करता रहूंगा खोज!!
“अमरत्व सबसे बड़ी कैद है”

4. इस दुनिया के जिस्म में,
उस दुनिया की जान!
इस दुनिया की आंखे,
उस दुनिया के कान!
इस दुनिया में उस दुनिया को उगाते हुए लोग!
….हम अधूरे लोग
रोटी के साथ में कहानी खाते लोग,
मयखानों में अपनी जवानी खाते लोग!
पत्थर को पीते और पानी खाते लोग!
…हम अधूरे लोग
शब्दों की लिखावट में नदी मोड़ते लोग,
तूलिका की कुदाल से पत्थर तोड़ते लोग।
मिट्टी की मूरत में जान जोड़ते लोग,
…हम अधूरे लोग!

5. जब भी कुछ शब्द स्वतंत्र करता हूँ,
जब भी दिल में गहरे पैठे विचार,
पर्तों से बाहर कीआबोहवा में, सांस लेते हैं।
जब भी बहती लहरों की तरह, उठते गिरते, बहते बहते ,
एक पुल से दूसरे पुल
एक नगर से होते हुए दूसरे नगर
मन से इठलाते हुय़े दिल,
फिर आत्मा में प्रवाहित होते रहते निरंतर
ठीक इसी वक्त एक प्यासा,
जो प्यास होंठो से उतरकर , दिल में पैठ गयी है.
जिंदगी के कठोर धरातल पर,
जिंदगानी के घिसते पहिए
अब थम गये हैं, जम गये हैं।
जब अहम के पेंच ढीले पड़ गये हों।
जव नैराश्य के घाव पीले पड़ गये हों।
जब रास्ते मे खड्ड गहरे आ गये हों।
जब वक्त के कुछ तमाशे नये हों।
तब प्रवाहित शब्द मेरे, उन रास्तों में भर जाऐंगे।
घाव के मरहम बनेंगे, पेंच सब कस जाऐंगे।
और अनोखी प्यास वो, जिंदगी का नैराश्य वो,
हृदय से मिट जाएगा, फिर न वापस आयेगा।
दफ्न हो जाऐगा शब्दों तले,
शब्द मेरे उस प्यास की चौखट में दे दस्तक
अस्तित्व की निर्रथकता बताऐंगे।
क्षणभंगुरता का परावर्तन दिखाऐंगे।
शब्दों की बहती कलकल से, काली स्याही धुल जाएगी।
मेरे शब्दों के बल पर, एक नई जिंदगी आऐगी।

6. सिकंदर सारी दुनिया के, फतहे परचम हमारा है।
पर अपनो के दिल में हम नहीं, ये नागवारा है॥
मुझे दिखता नहीं माकान, कुछ धुँध छाई है।
हमेँ एक टीस उठती है, उन्हे पर्दा गवारा है॥
उन्हे इंसाफ की ख्वाहिश, मेरे जज्बात से पूछो।
हमारे दिल के आईने में बना हर अक्श तुम्हारा है॥
कभी फिर बाढ आई थी, या कोई तूफान आया था।
फासले हैं दरम्याँ क्यों, क्यों खफा दूजा किनारा है॥

7. तेरे चेहरे पर भी नकाब है,
मेरे चेहरे पर भी नकाब है।
तेरी आंखो मे देखकर बदलता हूँ नकाब
वरना जरूरी नहीं ये रुतबा और रुआब
जब से ‘समझदार’ हुआ,
नकाबो का ही बसेरा है
भूल चुका हूँ वो चेहरा जो सच मे मेरा है।
धीरे धीरे मैं खो रहा हूँ अपनी संजीदगी,
और बन रहा हूँ उस दुनिया का एक हिस्सा,
जो बस मशगूल है एक पागलपन में,
जिसे मैं वीरान ऊँचाईयों से,
जब खामोश होकर एकटक देखता था,
तो मुझे दिखते थे, बदहवास लोग।
ये बदहवास लोग मुझे परेशान कर देते हैं।
अंधेरे माहौल सुनसान कर देते हैं।
फिर शुरू होता है एक नया संवाद।
संवाद?
पर किससे??
संवाद स्वयं से??
लेकिन ये तो बड़ा दुष्कर है,
खुद ही प्रश्न बनना
……और खुद ही उत्तर बन जाना।
तो संवाद किससे है?
ये संवाद है- आप से और आप के नकाब से।
एक नैसर्ग है मुझमें,
….. और एक कृतिम है मुझमें।
हालाँकि, अब उजाले हमें अजीज हो गये हैं।
क्योंकि उजाले में ही दूसरे हमें पहचान पाते हैं,
और दूसरों की नजर ही हमारे होने का इत्तला करती है हमें।
मगर हरदम ऐसा न था।
जब हमारे दूध के दाँत भी निकले न थे तब से,
ये अंधेरे हमें गोद में लिए उजालों की दुनिया से टहल रहे हैं।
हमारा अस्तित्व ही अंधकार का है।
चाँदनी तो आज भी चार दिन की ही है।
हर दुःख संताप में उजाले कहीं गायब हो जाते हैं।
तब अंधेरे ही हमें अपनी गोद देते हैं,
…. और हमारे पीठ में थपकियाँ।
आज भी हमारे चेहरे पर उजाला है,
……और पीठ पर अंधेरा।
मुझे अंधेरों ने पाला है।
आंखे खोलता हूं फैलाता हूं दुनिया!
आंखें बंद करता हूं, समेटता हूं दुनिया!
सांसों की डोर से, अटका है जीवन!
क्या जीवन?
मानो धुप अंधेरे में खुद को टटोलता आदमी!
मेरे चेहरे में पसरे काले साए देखो,
बस इतना ही जानते हो तुम मुझे।
मेरी जड़ें अंदर भी उतनी ही फैली हैं
दिखतीं हैं बाहर जटाऐं
जितनी कल तक धूप से हारकर मेरी छाँव में बैठे थे तुम!
आज तुम मेरी जड़ें खोदना चाहते हो।
लेकिन नींव दीवार से कहीं ज्यादा मजबूत होती है।
और तुम तो अभी दीवार पर ही पटक रहे हो सर अपना।
कहीं तुम हो न जाओ इस पथ पर लथपथ।
मेरी आँखों के चारो ओर फैले काले गोल धब्बे..
चेहरे पर पसरी कालिख…
.. से ज्यादा रूबरू है रोशनी,
जो तुम्हे दिखती है।
जिसे देखकर तुम खिचे आते हो मेरी तरफ,
….. समझकर संपूर्ण चेहरा।
और जब रूबरू होते हो,
काली घिनौनी हकीकत से,
तो भ्रम पाल लेते हो कि…
…. मैंने ओढ़ रखे थे नकाब
पाते हो कि…
तुम्हारा गोल गला खूनी पंजो की गिरफ्त मे है।
ये कटीले पंजे डराते हैं तुम्हे…
अपनी सख्तमिजाज निर्ममता से..
फिर तुम रोशन हिस्सों को घिसकर,
उँगलियो से, अंधेरो के ऊपर थोपने की कोशिश करते हो,
बेजान सी…
बेमतलब सी….
…….. कोशिश।
मैं जानता हूँ कि,
टूटते सपनो की डरावनी आवाजो ने छीन ली हैं,
तुम्हारे आंखो की नींद,
पर कड़वा तो कड़वा है।
हकीकत तो हकीकत है।
अब ये दर्द बनकर फैलेगा,
तुम्हारे बदन मे,
दिल मे,
जेहन मे,
और तुम्हारी नजरे देखेगी बार बार मेरी तरफ,
सवालिया अंदाज मे…
हर बार एक कुटिल मुस्कान,
.. हौसला तोड़ देगी तुम्हारा।
मेरे सुर्ख लाल होंठों के बीच उजले दाँत,
… बड़े नुकीले हैं।
डरावने हैं।
घड़ी की सुईंया रुक जाऐंगी,
देखने को तेरे डर का तमाशा।
आहटो को देखने पीछे नहीं मुड़ना…
हर हवा टकटकी लगाए तुम्हे ही घूरती होगी।
डर जाओगे,
जो मिली नजरे…………….
……..अपना ख्याल रखना

8.
मीठे खट्टे लाल गुलाबी
गोरे काले पीले धानी
चार कोष में पानी बदले
आठ कोष पर बानी।
रंगमंच में आकर देखो,
की कितनी मनमानी
हर दिन नया मुखौटा मेरा
हर दिन नई कहानी।
हर दिन रंग शर्बती आंसू,
हर दिन गाल गुलाबी,
हर दिन उजली हंसी हमारी,
हर दिन नयन शराबी,
कितने रंगों से खेले हैं हम
अपनी भरी जवानी,
हर दिन नया मुखौटा मेरा,
हर दिन नई कहानी।
हर दिन धूप तहाकर रखता,
हरियाली चादर में,
हर दिन बर्फ जमाकर रखता,
काले से बादल मे।
मेरी भलमनसाहत से फिर भी,
है दुनिया अनजानी।
हर दिन नया मुखौटा मेरा,
हर दिन नई कहानी।
शिकवा नहीं किसी से कोई,
न कोई कहीं गिला है।
कौन भला जग में ऐसा,
सबकुछ जिसे मिला है।
रंगमंच की कठपुतली सब
करतीं खींचातानी,
हर दिन नया मुखौटा मेरा,
हर दिन नई कहानी।

स्लैव
1.
मैं हिमालय की वादियों में रहता था,
बिल्कुल अलग थलग!
मेरे घर तक नहीं पहुंचा था विकास,
न बिजली, न कोई आवाज!
मेरे आस पास क्या
दूर दूर तक कोई घर नहीं था!
और मेरे घर में भी,
कोई और नहीं था!
मैं कोई काम नहीं करता था,
क्योंकि सेब के बगीचे और मीठे पानी से
भरा रहता है मेरा पेट!
चारो तरफ से मुझे घेरे पहाड़,
और पहाड़ों के ऊपर लगा नीले आसमान का ढक्कन,
के नीचे मेरे अलावा भी थे कुछ खरगोश,
नीली आंखों वाली बिल्ली,
और चमकीली आंखों वाला भालू,
सारे ही मेरे दोस्त!
मैं उसके झबरैले बालों में लिपटकर सो जाता था,
कभी- कभी
मैं आईने नहीं देखता था!
इसलिए कभी तन्हा था,
और कभी थोड़ा उदास!
कभी कभी मेरी खपरैल की छत
या मुंडेर में आ के बैठ जाती थी गौरैया!
और उससे मैं घंटों बातें करता था!
मेरे पास घड़ी नहीं थी,
और इसीलिए शायद मैं बूढ़ा नहीं होता!
सूरज के साथ उठता था
चांद के साथ सोता था!
१० कदम चलकर मेरी चौखट से,
बहता था झरना!
और पता है,
जब सावन भादों में
कड़कते हैं बादल
और चमकती है बिजली
तब मैं रात रात भर नहाता था झरने में
निवस्त्र!
खुद से क्या शर्म?
आम दिनों में मैं
झरने के सामने बैठकर सुनता था बूंदों का संगीत!
आलसी दिन धूप में गुजर जाते थे,
पर रात की वे सर्द हवा उफ!
देवदार को चीरती हुई,
मेरे जिस्म में एक सिरसिरी भर देती थी!
तब मुझे सितारों की गिनती छोड़कर,
मेरे घर में दुबकना पड़ता था!
वैसे वहां भी टिमटिमाते थे जुगनू
पर चांद नहीं था!!
जुगनू सुनाते थे लोरियां!
हवाऐं देती थी थपकियां,
और मैं हौले हौले नींद के समंदर में
एक बूंद सा हो जाता था,
अस्तित्वहीन!!!!

एक रोज मेरे पहाड़ों पे कुछ अजनबी आए,
साथ में ‘विकास’ लाए,
विकास के कहार एक डोली में छिपाकर
ले आए सियासत,
मेरे जंगलों तक!
उन्होने बताया, ये जमीन, जंगल पहाड़
सब सरकार के हैं!
सरकार?
वो कौन चिड़िया है!
मेरे सींचे पौधों की घनी छांव से बना जंगल,
जंगलों में पले खरगोश बिल्ली भालू!
और मुझे अपने आंचल में छिपाये पहाड़ों में
ये सरकार कब आ गई?
उनके पास कोई जवाब न था!
फिर वो बोले,
तुम्हे मुआवजा देगी सरकार!
मुआवजा? वो क्या होता है?
मुआवजा यानी पैसे, लाखों रुपये!
रुपये?
उनसे क्या होगा?
अरे मूर्ख उनसे पूरी होंगी तुम्हारी जरूरतें!
खाओ, पिओ ऐश करो!
पर मुझे जरूरत ही क्या है?
मेरा पेट भरा है!
उफ!!
अरे आदम मानव,
बदतमीज बेशर्म!
रहते हो निवस्त्र!!
आती नहीं शर्म!
तुम्हे जरूरत है कपड़ों की!
कपड़े बनते हैं मिलों में!
मिल हैं विलायत में,
वहीं से कपड़े लाऐंगे,
तुम्हे पहनाऐंगे,
सभ्य बनाऐंगे!
पर उसके लिए पैसे देने होंगे!
पर मुझे कपड़ों की जरूरत क्या है,
भगवान के कपड़ों से खूबसूरत क्या है?
और फिर मेरे पास पैसे भी नहीं!
विकास हंसा- तो हम दे रहे हैं न मुआवजा!!
जरूरते नहीं हैं तो बना लो!!
विकास को अपना लो!!
मैं उसकी धूर्तता से लाचार हो गया!
वो शहरी था मैं गंवार हो गया!
क्रेशरों से मेरे पहाड़ तोड़े गये!
शहरों से बिजली के खम्बे जोड़े गये!
मेरे जंगलों को काट मकान बन गये!
मेरे खरगोश बिल्ली भालू अनजान बन गये!
जहां झरना था वहां अजायबघर हो गया!
मेरा आशियाना शहर हो गया!
अब मैं कपड़े पहनता हूं, पिज्जा खाता हूं!
कभी कभी मैं अजायबघर जाता हूं!
अपनों से मिलने के लिए पैसे चुकाता हूं!
पिंजड़े में बंद है काला भालू सफेद खरगोश,
और नीली आंखों की बिल्ली!
सियासत ने बना दिया मेरा शहर भी दिल्ली!
रोये बिल्ली, चुप खरगोश
भालू हुआ हताश!
मैं भी पिंजरे में फ्लैटों के,
रहता सदा उदास!
मेरे हरे भरे जंगलों में कंक्रीट बो गया!
उनका ‘मुआवजा’ भी कल खर्च होते होते खत्म हो गया!
अब जुगनू नहीं बल्ब टिमटिमाते हैं!
प्लास्टिक के गुलदस्ते चिढ़ाते हैं!
न लोरी न झरने का संगीत!
कोलाहल से दुनिया की होता मन भयभीत!
कभी कभी जब चांद खिड़की से झांकता है,
मेरा सर चांदनी से ढांपता है!
मुझे स्वप्न में दिखता है,
वही जंगल, वही पहाड़, वो भीगी भीगी शाम,
त्राहिमाम! त्राहिमाम! त्राहिमाम!

2. ये महज तन्हाई नहीं,
उदासी भी,
हताशा भी,
नैराश्य भी,
वैराग्य भी है..
ये महज तन्हाई नहीं…..
महात्वाकांक्षाओं का मर्सिया,
वासनाओं की कब्रगाह,
वक्त की घुटन है,
ये महज तन्हाई नहीं!!
बंद आंखों के अंधेरे में सन्नाटों सी बहती सांस की धौंकनी पर
उबलती दुनिया में बुलबुलों सी तिल तिल फूलती….
फूटती….
जिंदगी का मातम है…
ये महज तन्हाई नहीं!!

3. कोई…
कोई बता दो..
सन्नाटों का कोना, गुमनामी का पता…
मैं एक कतरा भी नहीं रह जाना चाहता,
इस दुनिया का,
मुझे एक #मुकम्मल मौत चाहिए!!
पर ये सन्नाटे…
ये.. मेरी पीठ पीछे, तुम्हारी आवाज में बात करते हैं,
हू-ब-हू जैसे तुम!!
और ये गुमनामी, मुकम्मल गुमनामी..
मुझसे दूर भग जाती है,,
वो.. वो…
देखो वो छिप गई,,,
उफ्फ!!
मैं फिर अटका रह जाउंगा,
इस दुनिया में, कहीं न कहीं,
किसी तस्वीर में, किसी किताब में,
किसी याद में, या किसी खून में……
हाय….
मुझे छोड़ती क्यों नहीं दुनिया…!!
जालिम दुनिया..
मेरी मासूमियत छीन चुकी…
मेरा बचपना भी ले जाऐगी….
ले जाऐगी….
और बता देगी, मेरे दुश्मनों को मेरा पता..
किसी तस्वीर में उतरकर,
किसी किताब से गुजरकर,
किसी जेहन के रास्ते,
किसी खून को पकड़कर,
फिर ‘वो’ मुझ तक पहुंच जाऐंगे,
मुझे घसीट लाऐंगे,
और बार बार ऐसा करेंगे,
जब तक मैं मैं न रहूंगा..

4. तुम दुनिया को कैसे महसूस करते हो?
तुम दुनिया को कैसे महसूस करते हो,
मैं नहीं जानता,
शायद, दृश्य से, आवाज से, गंध से, स्पर्श से या स्वाद से,
पर मैं दुनिया को दर्द से महसूस करता हूं,
जो मुझे चारो ओर बिखरा दिखाई पड़ता है,
हर शोर में कोई चीखता सुनाई पड़ता है!
एक रोज मुझे तेज बुखार था,
इतना तेज मानो बेहोशी सी कोई
हजारों कत्लखाने मेरा सर काट रहे थे,
लाखों चिमनियों का जहर मेरी सांसो में घुल गया था!
मेरी आत्मा किसी चिड़ियाघर के पिंजरे में कैद,
बेबस सी मेरे फिक्रमंदो को बेबसी से ताक रही थी!
नदी में कांटा डाले किसी मछुआरे की तरह वो,
मेरे हलक से ‘अब ठीक हूं’ निकाल रहे थे!
दया, सांत्वना, आस्था और विश्वास के जाल,
किसी शिकारी की मानिंद मुझ पर उछाल रहे थे!
उस रोज मुझे सारी मानवता मुझ सी नजर आई,
दर्द में उलझाई गई,
शब्दों से फुसलाई गई,
बेबस और कमजोर..
और बस तभी से मैं दर्द को महसूस करता हूं..

5. मुझे अपनी आवाज से नफरत है..
क्योंकि मैं जब कुछ बोल रहा होता हूं,
या तुमसे, हां तुमसे, बात कर रहा होता हूं,
तो मैं ये मान बैठता हूं, कि तुम जो हो, हकीकत हो
या कम से कम हो!
और ठीक उसी पल मैं दुनियावी हो जाता हूं,
बेबस, लाचार और कमजोर..
मुझे बिल्कुल शिकायत नहीं है आवाजों से,
जो मुझे सुनाई पड़ती हैं
या आस पास फैले रंगों के संयोजनों से
जो दृश्य बन मेरे आस पास घूमते हैं!
वो सब मुझे बुलाते हैं,
तुम्हारी आवाजें, तुम्हारे दृश्य
जब उन्हे कोई उम्मीद नहीं होती मेरे बहलने की,
वो तब भी मेरा हाथ पकड़ते हैं
और जब मैं उनसे बहुत, बहुत दूर निकल चुका होता हूं,
मेरे हाथों में उनकी छुअन का अहसास होता है!
किसी प्रेयसी की भांति दुनिया मुझे रिझाती है!
पर जब मैं बोलता हूं, तो जैसे यकीन कर लेता हूं..
किसी मयकश सा आंख बंद कर बड़बड़ाता हूं
जैसे उसके आगोश में मेरा सर हो,
तू बस ख्वाब है, कोई हकीकत तो नहीं..
मुझे अपनी आवाज से नफरत है..

6. गीत हूं न कथा हूं,
मानव मन की व्यथा हूं,
व्यथित हूं, अकेला हूं मैं,
सैकड़ों का लेकिन मेला हूं मैं,
हजारों चेहरे हैं, लाखों हाथ हैं मेरे, अनगिनत अनसुलझे जज्बात हैं मेरे,
इतना अकेला हूं कि,
अंतरआत्मा बोलती है तो,
सुनने वाला कोई नहीं
और सुनती है,
तो बोलने वाला कोई नहीं..
अकेलेपन से ऊबकर बिखरता जाता हूं..
तब मैं झूठे ख्वाब फैलाता हूं
और उनमें खो जाता हूं,
ख्वाब…
ख्वाब में तुम,
हम और तुम,
बचे खुचे ख्वाब से दुनिया बनाता हूं!
इस तरह मैं दुनियावी होता जाता हूं!
7. वो मुझे देखकर
हंसता है
मुस्कराता है
खिलखिलाता है..
मेरे #वात्सल्य को
समझता है अपनी दुनिया।
पर,
दूर कहीं से आती हुई पुकार,
उसे खींचती है
वो चौंक पड़ता है
उधर भागता है,
क्यों? उसे नहीं मालूम।
धीमे धीमे दूर कहीं खो जाती है,
वो पीड़ा भरी पुकार,
मैंने उसे देखा है,
टूटते टूटते बिखरते
हताश निराश उदास
किसी साए के आसपास
घुटती आवाज में बोलता
सिसकता,
खामोश होता।
सुनो..
कहां गुम हो तुम..?
तलाश रहा हूं,
टटोल रहा हूं।
तुमसे ही बोल रहा हूं।
सुनो..
कहां गुम हो तुम..?
कसक के आखिरी छोर पर,
दम तोड़ती दुनिया को
फिर से जरूरत है,
खाक से उग खड़े होने की।
.8.एक रोज सूरज से आँखमिचौली खेलता चाँद वक्त की सीधी सपाट सड़क में चल रही मेरी मदमस्त जिंदगी की लापरवाहियों के तले कुचल गया।
बहुत दूर थीं मेरे वीरान शहर से तारों की हसीन बस्तियाँ,
और मैं थाल पर सागर उड़ेलकर आसमाँ को जमीन पर उतारने की गुस्ताखियाँ भी सीख न पाया था तब।
दर्द से कराहते चाँद को मैं दिनभर देखता रहा,
और आंखों की गहराइयों में समेटकर रख दी बिखरी हुई चाँदनी,
उस रात पहली अमावस थी।
उस रात पहली मर्तबा जुगुनुओं ने हादसों को शहर घुमाया।
उस रात कई मुफलिसों को लगा कि फुटपाथ भी अंधेरों में बेहया हो जाते हैं।
9. वो नहीं समझ सका,
तौर तरीके इस दुनिया के,
कि कैसे जिंदगी का
हर वाजिब, गैर वाजिब फैसला
सर झुकाकर स्वीकार कर लें।
सुनहरे कल का ख्वाब इतना जर्जर तो नहीं था,
कि करना पड़े प्रलाप
अतीत के भग्नावशेषों पर!
लो तोड़ दिया वो प्याला,
थी जिसमें जीवन हाला
लो वक्त के सारे रहमों को पल में ठुकरा कर चला गया।
एक विद्रोही तेरे जग में विद्रोह मचा कर चला गया!

10. सोचती है…
अपने शोर में दबा लेगी…,
उसकी पुकार……
पागल दुनिया
खुद को खोलती है,
उसे ढांकती है,
बार बार मुझे
हाथ पकड़ घसीट लाती है!
सोचती है…
मेरी नजरों से छिपा लेगी..
पागल दुनिया 😀
मुझे तो और साफ नजर आते हैं
भीड़ के बीच रास्ते,
मुझे और साफ सुनाई पड़ती है,
शोर में वो पुकार,
सुख, दुख, प्यार, नफरत सब,
ला ला के जमा करती है!!
सोचती है,
मुझे खिलौनों से फुसला लेगी,
पागल दुनिया

11.कई बार, सड़क से गुजरते,
चौराहे से सटे शोरूम के आईने में,
जब पड़ती है मेरी नजर,
मैं खुद को पहचान नहीं पाता हूं!
कई बार…..
यूं तो कम ही देखता हूं आईना,
कम ही होता हूं खुद से रू-ब-रू,
पर अकसर आते जाते पड़ जाती है नजर,
शोरूम के आईने पर!
और मैं खुद को चौराहे पर खड़ा पाता हूं!
कई बार…
मेरे ठीक पीछे बदहवास दौड़ रही होती है दुनिया,
शोर बन चुके होते हैं सारे संगीत!
बदलती रहती हैं आसपास की शक्लें,
पर वो आईना बस मुझे घूरता रहता है!
कई बार…

12.
अकेले बंद कमरे में पड़ा, खामोशियों का डेरा
बसेरी भूली यादों का, पड़ा था आज फिर मष्तिष्क में,
था कोलाहल अद्वितीय मन न रमा भौतिक भाव सागर में,
उठा ली लेखनी, कुछ खास लिखने को, अहसास लिखने को
अपनी बीती हुई यादें,
जहां था उत्साह का समंदर आशाओं के बादल, जो घुमड़ते थे,
वसुंधरा के पास चुपचाप से सुनसान में,
निस्तेज से निस्ताप से, बस चुपचाप उसको ताकते थे।
न जाने कौन सी मदिरा थी मदमस्त आंखों में कि
जिसको पीते पीते न भरा था मन कभी भी
पर प्याला हाथ कब पकड़ा डर था छलकने का।
लबों ने चूमी नहीं मदिरा, जिसे आंखों से पीता था
अद्भुत मोह है मादकता का
जो मन को ढाँप लेता है।
कि बंधनों से मुक्त गर हों
तो बस उसी में डूब हम जाऐं।
हमेशा के लिए
और आंख की ख्वाहिस
कभी लबों से पूरी हो
मिले मन से उसके मन फिर समा जाऐं
कि चढ़ जाए बदन में एक ऐसा नशा जो, उतरे कभी न,
शायद ऐसा ही होता हो स्वर्ग,
जिसकी कल्पना मानव ने की थी।
जिसे पाने की खातिर मरना पड़ता है,
अज्ञात में एक शून्य में जहां के उस पार, दूसरा न रास्ता है।
न कोई रोशनी, बस धुँधलका है।
जिसे छंटने में न जाने कितने लगेंगे वर्ष।
यादों की ये दुनिया, कल्पना का वो स्वर्ग है
जहां मधुशाला सा मधुमय है आलिंगन एक दूसरे का
एक मदिरा और मतवाला
जो उस गुमनाम रिश्ते में खामोशियों सा डूब जाता है।
एक दूसरे में, नशे में
कभी यादों के धुंधलके में
कभी कल्पना की रोशनी में।
बस यही कविता है मर्म हर कविता का,
जिसमें अल्फाजों के जुगनू जड़, चमका देता हूं मैं हमेशा,
तराशे हीरे की माफिक।
13. नजारों तक सिमटी नजर हो गई,
बड़े सस्ते में अपनी गुजर हो गयी,
न किसी ख्वाब का हमने पीछा किया,
जिंदगी यूं ही बसर हो गई!!
कड़ी धूप में हम निकल न सके,
ठोकर लगी तो संभल न सके!
कुम्हलाई तबियत असर हो गई,
जिंदगी यूं ही बसर हो गई!!
एक दुनिया कहीं और थी बसाई,
परियों सी दुल्हन से की थी सगाई!
किसी वृक्ष में बांध सपने कोई,
सोया नहीं, रातभर हो गई!
जिंदगी यूं ही बसर हो गई!
जिनको चाहा था वो कब हमारे हुए,
जात-परिजात से लोग हारे हुए!
स्वच्छंद नफरत, बेड़ियों में रहा प्रेम,
रिवाजों में ऐसी कसर हो गई!
जिंदगी यूं ही………!!

14. जिंदगी धुएं में उडाता गया मैं ,
छल्ले पे छल्ले बनाता गया मैं!
बड़ी तेज रफ़्तार से बढ़ चली जिंदगी
चक्कर पे चक्कर खाता गया मैं !!
हम तो बुरे हैं बुरी लत सुरूरी ,
सूरज सा उगाना नहीं है जरूरी !
हर भोर में डूब जाता गया मैं ,
जीवन को अंधेरो में लाता गया मैं !!
बुरे वक्त गुजरे बुरे दौर वाले ,
वो कड़क सर्द रातें हम बिन ठौर वाले !
घनी रात सा दिन बनाता गया मैं ,
जिंदगी धुएं में उडाता गया मैं !!
ये धुंधला सा लगता है वातावरण ,
है धुंधला सा दिखता मेरे दिल का दर्पण !
इन ख्वाबो को जेहन में सजाता गया मैं,
बुरा वक्त अपना बनाता गया मैं !!
ये कैसी जवानी ये कैसी बुलंदी ,
ये गजलें फ़साने ये बुझी जिंदगी !
जीवन मे अंधेरो को लाता गया मैं ,
घनी रात सा दिन बनाता गया मैं !!
हंसी न हमारी गमो की रवानी
ये आंसू ये पानी हमारी कहानी !
पानी से आंसू बहाता गया मैं ,
इसी आगोश में समाता गया मैं !!
तनहा अकेले हम ऐसे नहीं थे ,
जंहा हम रुके थे वंही हम सही थे !
एक रस्ते में खुद को बहाता गया मैं ,
अंधेरों में भी सनसनाता गया मैं!!
हमें क्या मुसाफिर कंही ठहर जाएँ ,
खुशी की हो बस्ती ,या गमो के हो साये!
हर महफ़िल में गमो को छिपाता गया मै,
मायूसी को लबों से लगाता गया मैं !!
मुबारक तुम्हे ये तुम्हारा जंहा हो ,
मुबारक तुम्हे दे रहा असमान हो !
शुरूरों की दुनिया सजाता गया मैं
, दुनिया से तनहा सा जाता गया मैं !!
कंही तो कमी है हमारी जन्हा मे ,
मुसाफिर सभी थक गए कारवाँ के !
थके कारवां को चलाता गया मैं ,
एक रस्ते मैं खुद को बहाता गया मैं !!
ये लत है खुदा की या किस्मत हमारी
ये बैचैन राते कशो की खुमारी !!
हर एक कस मैं कसमसाता गया मैं ,
जिंदगी धुएं में उडाता गया मैं !!

15. राहु-केतु के साये में
धूप हुई छिमछिम छिमछिम
सावन की घनघोर बदरिया,
पर बारिश रिमझिम रिमझिम।
धा धी धिमक धिमक धिन धा,
धा धिन धिन धा धिमधिम धिमधिम।
दीप जल रहा था जो अंदर,
उसकी लौ मद्धिम मद्धिम।
इस पार मरे, उस पार मरे,
सृष्टि के किस पार मरे।
हे कालपुरूष तू ही बतला,
जीवन किस आधार मरे?
तब कालपुरुष का मन डोला,
अंतर्मन में झांक मेरे बोला।
जीवन को तुम कब चुनते थे,
भीतर मृत्युनाद सुनते थे।
अब क्रूर काल जब स्वप्न दिखाता
आ रहा पास लोरियां सुनाता।
मत भागो रुक स्वीकार करो,
नियति को अंगीकार करो।
दो चार दिवस, दस पांच दिवस
तू चल, फिर मैं भी आता हूं।
तू सुंदर वन की पौध लगा,
मैं दावानल सुलगाता हूं।

16. मैं भूला भटका आ पहुंचा जीवन की भूलभुलैया में,
कैसे खोजूँ इस भवसागर में, नौका का कुशल खवैया मैं।
हे पार्थ, रहे तुम बड़भागी तो सारथि कृष्ण हुए तेरे,
दिखलाया तुमको परममार्ग, जब दुविधा थी तुमको घेरे।
सतयुग त्रेता द्वापर सब कालचक्र में गुजर गये,
कलिकाल आ गया कलि न मिले, मिलते पाखंडी नये नये।
अंधकार में जो हैं खुद भटके, वो जग को राह दिखाते हैं,
अंधों की नगरी में काने दिव्यचक्षु कहलाते हैं।
तुमने मुझे जगाकर मेरा, प्यारा सा सपना तोड़ दिया!
मंजिल बिना बताऐ ही, चौराहे पर छोड़ दिया!
अब झूठे मुझको लगते हैं, दुनिया के सारे अफसाने,
आ जाओ हृदय में भगवन अब, रस्ता मुझको दिखलाने।
दौलत,शोहरत,इज्जत सब ही, माटी मूरत सी बिखर गये,
आशा,इच्छा, सपने भी, आके दिल से गुजर गये।
क्या भूलूँ,क्या याद करूँ, जो बीत गया वो बात गई,
कोलाहल से मन भर आया, शांति कहीं भी मिली नहीं।
आखिर कैसे ये सागर, लहरों की छत के छत के नीचे सोता है।
अंधेरों के दामन में ही, सन्नाटा क्यों होता है।
युगों युगों से पर्वत कैसे, हैं इतनी घोर समाधी में।
पेड़ों को क्यों विश्वास नहीं, धरणी से आजादी में?
हे महाकाल आराध्य मेरे, एक दरश मुझे दे जाओ कभी।
कब से मन ये भरा पड़ा है, ये व्यथा मेरी ले जाओ कभी।
मैं शिवाँश हूँ,भटक रहा हूँ, मायाजाल के मिथ्या में।
मैं आकंठ नशे में डूबा, चेतन मेरा निद्रा में।
रात्रि ढल चली,तिमिर घना है, एक राह मुझे दे जाओ कभी हे
महाकाल आराध्य मेरे, दरश मुझे दे जाओ कभी।
तुम मुझसे नाराज छुपे बैठे, और मेरा गला है रुँधा हुआ
पथ का भटका राही मैं, मोहपाश में बंधा हुआ।
मैं भाव चढ़ाऊँ,मंदिर जाऊँ या अश्रु से श्रंगार करूँ।
हे प्रभु बता दो आखिर कैसे, मिलने का त्योहार करूँ।
मुझ प्यासे चातक के जीवन में बनकर सावन आओ कभी।
हे महाकाल आराध्य मेरे, दरश मुझे दे जाओ कभी।